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📢 Dhamma Mitra - Live Mode Announcement 📢 नमो बुद्धाय | मंगल हो! 🙏 सभी साधक मित्रों को सूचित करते हुए हमें बहुत प्रसन्नता हो रही है कि आपका अपना प्लेटफॉर्म Dhamma Mitra अब टेस्टिंग मोड (Beta) से निकलकर पूरी तरह से Live हो चुका है। 🌐 अब आप हमें यहाँ एक्सेस कर सकते हैं: 👉 https://dhammamitra.org/ (महत्वपूर्ण सूचना): पहले यह प्लेटफॉर्म beta.dhammamitra.org पर चल रहा था, लेकिन अब आपको केवल ऊपर दिए गए मुख्य लिंक का ही उपयोग करना है। जिन साधकों ने पहले ही रजिस्ट्रेशन कर लिया है, उन्हें दोबारा रजिस्टर करने की आवश्यकता नहीं है। आपकी पुरानी ID और जानकारी सुरक्षित है। जिन्होंने अभी तक रजिस्ट्रेशन नहीं किया है, उनसे विनम्र अनुरोध है कि आज ही जुड़ें और इस सेवा का लाभ उठाएं। 🤝 धम्म सेवा का अवसर: हम इस ग्रुप के सभी साधकों से एक विशेष अनुरोध करते हैं: अपने नजदीकी धम्म सेंटर में 'मंगल मैत्री' (Course के अंतिम दिन) के अवसर पर जरूर जाएं। वहाँ आने वाले पुराने साधकों को Dhamma Mitra प्लेटफॉर्म और हमारे व्हाट्सएप ग्रुप के बारे में जानकारी दें। संभव हो तो धम्म सेंटर के मैनेजमेंट से अनुमति लेकर, हमारे व्हाट्सएप ग्रुप का QR Scanner और वेबसाइट का लिंक वहां के Notice Board पर जरूर लगाएं ताकि अधिक से अधिक साधक इस 'मित्र मंडली' से जुड़ सकें। आइये, निष्काम कर्म और सेवा की भावना से इस संघ को और मजबूत बनाएं। भवतु सब्ब मंगलं!

be happy!

Ranjit Paul 1 week ago

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Ranjit Paul

1 month ago

🙏🪻 “यह युग चमत्कार दिखाने के लिए नहीं है, जैसे कि आकाश में उड़ना और पानी की सतह पर चलना, जिसका सामान्य लोगों को कोई सीधा लाभ नहीं हो सकता। परंतु यदि लोगों की शारीरिक एवं मानसिक व्याधियां साधना द्वारा दूर की जा सकें तो यह कुछ गंभीरतापूर्वक विचार करने योग्य बात होगी। विश्व गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। हर किसी के लिए यही उपयुक्त समय है कि विपश्यना साधना को अपनाये और जो कुछ आज हो रहा है उसके बीच गहराइयों तक शांति की खोज करना सीख सके। बाहर-बाहर के भौतिक तत्त्वों में परमाणु शक्ति पर विजय पाने के लिए बुद्धि का प्रयोग करने के बजाय इसे भीतर की परमाणु शक्ति पर विजय पाने के लिए भी क्यों न काम में लिया जाय ? इससे हमें आंतरिक शांति मिलेगी जिसे हम दूसरों के साथ बांट भी सकेंगे।” सयाजी ऊ बा खीन

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Ranjit Paul

1 month ago

🙏🪻गुरूजी, अगर आदमी आदमी में भेद नही मानना चाहिये तो एक व्यक्ति दूसरे से दिखने में, स्वभाव आदि में अलग अलग क्यों होता है? निसर्ग सबको एक जैसा क्यों नही बनाती?निसर्ग तो भेद भाव करती हैं ना। उत्तर--नही, निसर्ग कोई भेदभाव नही करता। प्रकर्ति हमारा स्वभाव नही बनाती। हर व्यक्ति अपनी समझदारी या नासमझी से अपना अच्छा या बुरा स्वभाव बनाता है।और स्वभाव बनाने का यह क्रम इसी एक जीवन का नही है, अनेक जन्मों से चला आ रहा है। पूर्व जन्मों का स्वभाव इस जन्म के स्वभाव को प्रभावित करता है। 🪻परंतु यदि समझदार व्यक्ति अंतर्मुखी होकर अपने स्वभाव की जड़ो तक पहुँच कर अपने स्वभाव को बदलने का प्रयत्न करे तो बदल सकता है। प्रकृति तो प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपने स्वभाव के अनुसार किये गए अच्छे बुरे कर्म का फल देती है। इसमे वह रंच मात्र भी भेदभाव नही करती।

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Ranjit Paul

1 month ago

🙏🪻*पूज्य गुरुजी द्वारा परिवार को लिखे गये धर्म-पत्र* : पूज्य गुरुजी ने इन धर्म-पत्रों में संबोधन तो परिवार को किया है पर लिखा है सभी साधकों के लाभार्थ। वाराणसी शिविर : धर्म के पुनरुत्थान का प्रतीक पड़ाव: बाराचकिया 9 सितंबर, 1970 प्रिय शंकर-सीता, राधे-विमला, गिरधारी-मंजु, सप्रेम मंगल कामना! वाराणसी का शिविर लगाकर जो असीम पुण्य अर्जित किया उसमें तुम सबको, पूज्य मां और पिता जी को, तथा परिवार के अन्य सभी सदस्यों को भागीदार बना कर मन अत्यंत प्रसन्न हुआ है। साधुकार द्वारा पुण्यानुमोदन कर धर्म-लाभी बनो। इस शिविर की विशेषता यही थी कि यह बनारस जैसे तीर्थ स्थान पर लगा जो कि मिथ्यादृष्टि का गढ़ है, और गंगा नदी के तट पर लगा जहां कि दिन-रात अंधविश्वास का घना अंधकार ही छाया रहता है। प्रज्ञा और ज्ञान का आलोक मिथ्या मान्यताओं के घने बादलों के पीछे छिपा रह जाता है। ऐसे स्थान पर धर्म-धातु का जागरण अपने आप में एक महत्त्व की बात है। मैं इसे धर्म के पुनरुत्थान का प्रतीक ही मानता हूं। डालमिया कोठी के बरामदे में खड़े होकर जब कभी मैं नीचे घाट की सीढ़ियों पर सैकड़ों स्त्री-पुरुषों को भावावेश से अंधभूत होकर गंगा में डुबकियां लगाते हुए देखता तो मेरा मन उनके प्रति करुणा भाव से ही भरता। काश इन्हें धर्म का ज्ञान होता, इनकी प्रज्ञा जागृत होती तो ऐसी मिथ्या मान्यताओं में अपना समय नष्ट नहीं करते और चित्त विशुद्धि के लिए इस नदी के जल का सहारा छोड़ कर कुछ और अभ्यास करते जो कि चित्त से संबंध रखने वाला होता। लोगों में आज से नहीं हजारों वर्षों से कैसा अंधकार फैला हुआ है कि गंगा के जल में पाप नष्ट करने की ताकत है। किसी जल से शरीर का ऊपरी मैल छूट जाय, यह बात तो समझ में आ सकती है और वह भी तभी छूटे जबकि पानी स्वच्छ हो, साफ हो। यदि नदी का जल गंदला है तो शरीर को साफ करने की बजाय गंदा ही करेगा। परंतु यह मानना तो नितांत पागलपन है कि उस जल में पाप काट देने की शक्ति है। पाप कहां लगे रहते हैं, क्या पाप शरीर पर चिपके रहते हैं, यदि ऐसा होता तो नदी का जल शरीर पर लगे हुए उस पाप को छूता और शायद धो भी देता। परंतु पाप का संबंध तो अपने चित्त से है। सारे पाप-पुण्य चित्त से होते हैं और गंगा का जल उस अभौतिक चित्त को कैसे छू पाए, कैसे उसका पाप धो पाए। परंतु जब आदमी किसी अंध मान्यता के भावावेश में डूबा रहता है तो उसके विवेक की आंखों पर पट्टी बंधी रहती है, उसका ज्ञान और उसकी प्रज्ञा लुप्त रहती है। वहां कोई तर्क-बुद्धि, न्याय-बुद्धि अथवा धर्मबुद्धि का प्रवेश नहीं हो पाता। कोई बात संगत है अथवा असंगत है, इसका सत्यासत्य विवेचन हो ही नहीं पाता। सच्चा धर्म हमें हर प्रकार के अंधविश्वास से दूर करता है और हमारी प्रज्ञा जागृत करता है, जिससे कि हम स्याह और सफेदी का फर्क जान सकें , सच और झूठ का अंतर पहचान सकें । जहां सच्चा धर्म है, वहां अंधविश्वास टिक ही नहीं सकता और अंधश्रद्धा ठहर ही नहीं सकती। धर्म मार्ग के लिए श्रद्धा नितांत आवश्यक है, श्रद्धा के बिना मार्ग पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता। श्रद्धा के बिना साधक लंगड़ा रहता है। श्रद्धा ही साधक के सबल चरण हैं। यदि प्रज्ञा हो, ज्ञान हो परंतु श्रद्धा का नामोनिशान न हो तो साधक की दशा उस यात्री की तरह है जिसकी आंखें तो खुली हैं लेकिन दोनों पांव कटे हुए हैं, इसलिए चल नहीं सकता। परंतु यही श्रद्धा जब अंधश्रद्धा का रूप धारण कर लेती है तब विवेक और ज्ञान समाप्त हो जाते हैं। ऐसा यात्री पांव से चल सकने में तो बहुत सबल व पुष्ट होता है, परंतु आंखों से अंधा होता है, इसलिए सही मार्ग पर चल नहीं पाता। राजपथ छोड़कर किन्हीं अंधी गलियों में भटकने लगता है। इसलिए कल्याण इसी बात में है कि साधक के पास श्रद्धा रूपी टांगे भी हों और साथ-साथ प्रज्ञा और विवेक रूपी आंखें भी। इन दोनों के मेल से ही साधक बिना रास्ता भटके हुए आसानी से राजपथ पर चलता हुआ, शीघ्र ही गंतव्य लक्ष्य पर जा पहुँचता है। भगवान ने हमारी सफलता के लिए पांच बल बताए हैं—श्रद्धा, वीर्य, स्मृति , समाधि और प्रज्ञा। इसमें हम देखते हैं कि श्रद्धा आधार शिला है, मानो हमारे कदम हैं, जिन पर साधना का सारा शरीर खड़ा है और प्रज्ञा हमारा मस्तिष्क है, हमारी आंखें हैं जो कि हमारे चरणों को सही रास्ते पर चलने का निर्देश करती है। इन दोनों का संयोग मणि-कांचन (स्वर्ण+रत्न) संयोग है और अत्यंत कल्याणकारी है। धर्म दान के पुण्य बल के प्रभाव से सद्धर्म के प्रति सब की श्रद्धा बलवती हो और निर्वाण के प्रति प्रज्ञा जागृत हो, यही मंगल कामना है। साशिष, स. ना. गोयन्का

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Ranjit Paul

1 month ago

🙏🪻*गुरुदेव के सांप्रदायिकता विहीन प्रशिक्षण का एक उदाहरण* :- एक कट्टर ईसाई विपश्यना सीखने आया। प्रारंभिक औपचारिकताओं के सार को समझाते हुए जब गुरुजी ने तीन रत्न की शरण लेने के लिए कहा तो वह व्यक्ति बहुत घबराया। उसे लगा कि इस प्रकार उसे ईसाइयत से बौद्ध सम्प्रदाय में दीक्षित किया जा रहा है और इस निरर्थक भय से भीत होकर वह बुद्ध की शरण ग्रहण करने से मुकर गया। कहने लगा, “शरण लेनी है तो ईसा-मसीह की लूंगा, बुद्ध की नहीं।” “बहुत ठीक " गुरुजी ने मुस्कराते हुए कहा। "ईसा-मसीह की ही शरण ग्रहण करो । पर इसी समझदारी के साथ कि तुम वस्तुतः ईसा-मसीह के गुणों की शरण ग्रहण कर रहे हो, ताकि वे गुण तुम में भी जागें । पर काम मैं जैसे बताऊ वैसे ही किए जाओ।" उसने वैसे ही काम किया। शील, समाधि, प्रज्ञा का और शिविर समाप्त होते-होते वह अपने प्रारंभिक विरोध के लिए बहुत पछताया। वह जान गया कि सम्प्रदाय में दीक्षित होने का उसका भय नितांत निर्मूल था।

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Ranjit Paul

1 month ago

🍁संबोधि पश्चात प्रथम आहार ~पुण्यवान तपस्सु-भल्लिक🍁 🌿🌼उत्कल (उड़ीसा) को उन दिनों उक्कल कहते थे। वहां के कुछ लोग इरावदी नदी के मुहाने पर जा बसे थे। अत्यंत रमणीय होने के कारण उसका नाम रमण्य देश रखा। 🌿🌸वर्मा देश में जहां आज रंगून नगर है, वहां उन्होंने उक्कल देश की याद में उक्कल नाम का एक नगर बसाया। आज भी रंगून नगर के समीप उक्कलापा नामक एक उपनगर बसा हुआ है। 🌿🌹वहां के तपस्सु और भल्लिक नाम के दो व्यापारी व्यापार के सिलसिले में भारत आए और उरुवेल वन में से यात्रा करते हुए उन्होंने बोधिवृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध को ध्यानस्थ बैठे देखा। 🌿🔥भगवान को बुद्धत्व प्राप्त किए हुए सात सप्ताह बीत चुके थे। व्यापारियों ने अत्यंत श्रद्धापूर्वक अपने साथ लाए हुए भात और मधु से बने मोदक भगवान को अर्पित किये। यह सम्यक संबुद्ध का पहला भोजन था। 🌿🌻🪷इस घटना के स्मृति स्वरूप उन्होंने भगवान से कुछ भेंट चाही। भगवान का हाथ अनायास अपने सिर पर गया और सिर के आठ बाल उनके हाथ में आ गये। वे दोनों उन आठ बालों को लेकर खुशी-खुशी स्वदेश लौट चले। अपने लौटने की अग्रिम सूचना उन्होंने स्वदेश भिजवा दी। 🏵️महाराज उक्कलपति और उक्कल के नागरिकों ने उन केशधातुओं का सम्मानपूर्वक स्वागत किया। नगर के समीप डगोन पहाड़ी की चोटी पर श्वेडगोन नामक स्तूप बनाकर उसके गर्भ में ये केशधातु स्थापित कर दी गयीं ताकि उस देश की जनता भावी पीढ़ियों तक उनके पूजन-अर्चन का लाभ ले सके। 🏵️इस यात्रा में तपस्स और भल्लिक को पूजन के लिए भगवान की केशधातु मिली, सम्यक संबुद्ध को प्रथम भोजनदान देने का परम पुण्यमय सौभाग्य मिला, परंतु भगवान ने विपश्यना के रूप में जिस मुक्ति प्रदायक शुद्ध धर्म की खोज की थी, उससे वह वंचित ही रह गये। वह उन्हें अगली किसी यात्रा में मिला। 🌿💥इसका अभ्यास करके ही भल्लिक अरहंत अवस्था को प्राप्त हुए। इस प्रकार इरावदी नदी के मुहाने पर बसे रमण्य देश में विपश्यना का प्रथम प्रवेश हुआ। साभार ~ ♦️विपश्यना विशोधन विन्यास ❤️सब का मंगल हो

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Ranjit Paul

1 month ago

🌷प्रश्न- आनापान करते समय हमें यह कैसे पता चले कि हमारी समाधि मजबूत हो गई है और अब विपश्यना शुरू कर देनी चाहिए ? उत्तर- जैसे ही मन का कोलाहल कम पड़ जाय और जैसे ही यहाँ (ऊपर वाले होंठे के ऊपर, नाशिका के नीचे) संवेदना मिलनी शुरु हो जाय... । अगर यहीं संवेदना नहीं मिली तो अभी रुको । और यहीं संवेदना मिलने लगी तो फिर सारे शरीर की विपश्यना शुरु कर सकतें हो, चिन्ता की बात नहीं है। 🌷प्रश्न- संवेदना मालूम पड़ती है पर उसका उदय-व्यय नहीं मालूम पड़ता, कया करें? उत्तर- संवेदना का अर्थ ही कुछ बदल रहा है भीतर ही भीतर । संवेदना क्या है ? भीतर खटपट हो रही है तो संवेदना है । जो कुछ हो रहा है इसका अर्थ यहीँ है कि कुछ बदल रहा है । बहुत स्पष्ट रूप से--- यह उदय हुआ और यह व्यय हो गया, यह उदय हुआ यह व्यय हो गया, समझने में अभी देर लगती है तो कौई हर्जा नहीं । कुछ घटना घट रही है, यहीं पर्याप्त है । यह इस बात का सबूत है कि भीतर कुछ बदल रहा है । ऐसा नहीं है कि यह स्थायी (स्टेटिक) है और अंदर कुछ नहीं हो रहा, कुछ नहीं बदल रहा- ऐसी बात नहीं है । 🌹गोयंका गुरुजी 🌹🙏🙏🙏

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Ranjit Paul

1 month ago

Be Happy!

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Ranjit Paul

1 month ago

Guruji, Be Happy!

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Namo buddhay! 15 days to go live at https://dhammamitra.com

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