अस्तेय (Asteya)
"अदिन्नादाना वेरमणी सिक्खापदं समादयामि"
अर्थ (Definition)
अस्तेय का अर्थ है "चोरी न करना"। जो वस्तु हमें दी न गई हो, उसे बिना अनुमति के लेना या हड़पना अस्तेय के विरुद्ध है। यह ईमानदारी और न्यायपूर्ण जीवन का आधार है।
बुद्ध वाणी (The Buddha's Teaching)
बुद्ध ने कहा है कि लोभ और तृष्णा ही दुख का कारण है। चोरी करना लोभ का परिणाम है। त्रिपिटक के अनुसार, अस्तेय व्रत का पालन करने वाला व्यक्ति दूसरों की संपत्ति का रक्षक बन जाता है। धम्मपद में कहा गया है कि जो व्यक्ति अधर्म से धन कमाता है, वह स्वयं अपनी जड़ों को खोदता है।
दैनिक जीवन में अभ्यास (Practice)
हमें अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना चाहिए और अपनी मेहनत की कमाई पर संतोष करना चाहिए। किसी की गिरी हुई वस्तु को भी बिना पूछे नहीं उठाना चाहिए। यह केवल धन तक सीमित नहीं है, बल्कि समय, विचार और अधिकारों की चोरी भी इसके अंतर्गत आती है।
पालन करने के लाभ (Benefits)
- समाज में सम्मान और विश्वास प्राप्त होता है।
- मन में लोभ और असंतोष का नाश होता है।
- धन और संपत्ति की सुरक्षा रहती है।
- निर्भयता आती है (चोर को हमेशा पकड़े जाने का डर रहता है)।
- चित्त की एकाग्रता बढ़ती है जो ध्यान में सहायक है।
साधक का आचरण
अस्तेय का पालन करने वाला साधक परम संतोषी होता है। उसे दूसरों के धन या वैभव से ईर्ष्या नहीं होती। वह 100% ईमानदार होता है और कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता।
विश्वास का आधार (Why Trust?)
जब आप किसी अनजान शहर में होते हैं, तो सबसे बड़ा डर सामान चोरी होने या ठगे जाने का होता है। धम्म मित्र का साधक अस्तेय व्रत का पालन करता है, इसलिए आप अपने जान-माल की सुरक्षा के प्रति निश्चिंत रह सकते हैं।
साधकों के इस परिवार में आपका स्वागत है
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