ब्रह्मचर्य (Brahmacharya)
"कामेसु मिच्छाचारा वेरमणी सिक्खापदं समादयामि"
अर्थ (Definition)
गृहस्थों के लिए इसका अर्थ है "कामेसु मिच्छाचार" यानी व्यभिचार से बचना। यह अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार रहने और पर-स्त्री या पर-पुरुष के प्रति कामुक विचार न रखने का व्रत है। साधुओं के लिए यह पूर्ण इंद्रिय संयम है।
बुद्ध वाणी (The Buddha's Teaching)
बुद्ध ने कामवासना को "तृष्णा" का एक प्रबल रूप माना है जो संसार के बंधन में बांधता है। पराभव सुत्त में बुद्ध कहते हैं कि जो व्यक्ति वेश्यावृत्ति, पर-स्त्री गमन और जुए में लिप्त रहता है, उसका विनाश निश्चित है। शीलवान व्यक्ति अग्नि के समान पवित्र होता है।
दैनिक जीवन में अभ्यास (Practice)
इंद्रियों को नियंत्रित रखना और मन में कामुक विचारों को न आने देना। अपने जीवनसाथी में ही संतुष्ट रहना। अश्लील साहित्य या दृश्यों से दूर रहना। यह विपश्यना साधक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि कामुकता चित्त की समता को भंग करती है।
पालन करने के लाभ (Benefits)
- परिवारों में प्रेम और विश्वास बना रहता है।
- चरित्र बलवान और तेजस्वी होता है।
- मन की चंचलता समाप्त होती है और फोकस बढ़ता है।
- शारीरिक और मानसिक ओज (कांति) की वृद्धि होती है।
- समाज में महिलाओं और कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
साधक का आचरण
ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले साधक की दृष्टि में पवित्रता होती है। वह विपरीत लिंग के प्रति सम्मान का भाव रखता है। उसका आचरण मर्यादापूर्ण और संयमित होता है।
विश्वास का आधार (Why Trust?)
एक अनजान स्थान पर सुरक्षा, विशेषकर महिला साधकों के लिए, एक बड़ी चिंता होती है। धम्म मित्र के साधक शीलवान होते हैं और अपनी मर्यादाओं का पालन करते हैं, जिससे यह मंच सभी के लिए, विशेषकर अकेले यात्रा करने वालों के लिए, अत्यंत सुरक्षित बन जाता है।
साधकों के इस परिवार में आपका स्वागत है
धम्म मित्र सिर्फ एक वेबसाइट नहीं, बल्कि शीलवान लोगों का एक समुदाय है।